वनन में बागन में बगरयो बसंत है
प्रेम का उत्सव
है बसंत आया न जाने कितने ही हृदयों में
अंकुरित होगा प्रेम बीज।
आरंभ होगा कभी न होने वाले अंत का।
उस उर में समाए आनंद का जो,
समय के साथ ले लेगा परमानंद का रूप।
जिसकी कल्पना मात्र मन, को प्रफुल्लित कर जायेगी।
जो आत्मा में समा कर, स्वयं परमात्मा सा हो जायेगा
जो रोम रोम में नव किरण सा समाएगा।
पल प्रतिपल गंगा सा पावन, हो बढ़ेगा सागर की ओर।
चाहे हो जंगल, बीहड़ या मरुस्थल
कुछ भी न उसे रोक पायेगा।
प्रेम के सागर में जो बिन सोचे समझे उतर जायेगा।
संसार के भव सागर से वो पार हो जायेगा।
प्रेम में उमंग है, उल्लास है।
प्रेम कभी न बुझने वाली प्यास है.......!!!!!
विवेकाजल✍️✍️
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