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चाहत

कुछ कुछ रजनीगंधा के फूलों सी तेरी खुशबू। खाली कमरे से दिल में मेरे झोंके सी आ जाती है। कभी चाँद की चादर में लिपटे कुछ लम्हे संग ले आती है। कभी बारिश की बूंदों में भीगी भीगी सी आती है। कभी फ़ागुन के रंगों में रंगी गुलाल लगा के आती है। कभी अंधियारे पाख में ये दीपशिखा बन आती है। कभी संग लेटती मेरे वो चादर की सिलवटों के संग। जाती है चली फिर सुबह सवेरे रंग के मुझको तेरे रंग। कभी लेके आती ख़्वाबों की झाँकी जो देखे थे हमने संग संग। कभी बेरंग से जीवन में भरती साँझ का वो सिंदूरी रंग। एहसास करा जाती है मुझको उन रूहानी लमहों का। जो पूरे चाँद की छांव तले कभी हमने संग गुज़ारे थे। वो लम्हे जो हम दोनों ने एक दूजे पे वारे थे। विवेक कुमार मिश्र ✍️✍️
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#हाईस्कूल_का_रिजल्ट_तो_हमारे_जमाने_में_ही_आता_था... रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी तर ली हो  (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूँछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था।  दसवीं का बोर्ड...बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे।  जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,"अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं" !! रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते..." भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो...  और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो एक दिन पहले ही शहर के दो- तीन हीरो (ये अक्सर दो पंच वर्षीय योजना वाले होते थे) अपनी हीरो स्प्लेंडर या यामहा में शहर चले जाते। फिर आधी रात को आवाज सुनाई देती..."रिजल्ट-रिजल्ट" पूरा का पूरा मुहल्ला उन पर टूट पड़ता। रिजल्ट वाले #अखबार को कमर में खोंसकर...