चाहत
कुछ कुछ रजनीगंधा के फूलों सी तेरी खुशबू। खाली कमरे से दिल में मेरे झोंके सी आ जाती है। कभी चाँद की चादर में लिपटे कुछ लम्हे संग ले आती है। कभी बारिश की बूंदों में भीगी भीगी सी आती है। कभी फ़ागुन के रंगों में रंगी गुलाल लगा के आती है। कभी अंधियारे पाख में ये दीपशिखा बन आती है। कभी संग लेटती मेरे वो चादर की सिलवटों के संग। जाती है चली फिर सुबह सवेरे रंग के मुझको तेरे रंग। कभी लेके आती ख़्वाबों की झाँकी जो देखे थे हमने संग संग। कभी बेरंग से जीवन में भरती साँझ का वो सिंदूरी रंग। एहसास करा जाती है मुझको उन रूहानी लमहों का। जो पूरे चाँद की छांव तले कभी हमने संग गुज़ारे थे। वो लम्हे जो हम दोनों ने एक दूजे पे वारे थे। विवेक कुमार मिश्र ✍️✍️