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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक नज़र

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वो जिस दिन मिल कर बिछड रहे थे, ना जाने और क्यों याद आ रहे थे  दिल गवाही नही दे रहा था उनसे नजरे हटा ले, और वो देखो हमे छोड कर जा रहे थे  वो जिस दिन मिल कर बिछड रहे थे, ना जाने और क्यों याद आ रहे थे  शमा जली थी जो मिलन की आंसूऔ से बुझी जा रही थी  बैठे रहे इंतजार में मुद्दतो से और जुदाई की घड़ी भी आ रही थी  रोकना चाहा इक पल फिर से उन्हे दामन में, जाने के पैगाम उन्हे जगा रहे थे  वो जिस दिन मिल कर बिछड रहे थे, ना जाने और क्यों याद आ रहे थे  क्या करू मैं भी कहते हैं किस्मत से बगावत होती नही  जो चाहते हैं हम तुम जिंदगी में मोहब्बत उस पल वो मिलती नही  आइने आ जाए हजार सामने मगर, फिर भी तेरी सूरत मिला रहे थे  वो जिस दिन मिल कर बिछड रहे थे, ना जाने और क्यों याद आ रहे थे  हमने आंसूऔ से इक रात और सही, तेरे इंतजार में लिख दी  रोज रोज ये अदालतो में ये बेगुनाही की पेशी हमने लिख दी  मालूम थी सजा हमे फिर भी ये गुनाह किए जा रहे थे  वो जिस दिन मिल कर बिछड रहे थे, ना जाने और क्यों याद आ रहे थे  वो जिस दिन मिल कर बिछड रहे थे, ना जाने और क्यों याद आ रहे थे  दिल गवाही नही दे रहा था उनसे नजरे हटा ले, और वो दे...

आलम दिल का

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दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! दिल ए हाल लिख रखा था कोरे कागजों के चंद लिफाफों में !! कैसे संभाले अब खुद को टूटते इन ख्वाब के पन्नों से ! जीत कर भी हम तो हारे हैं इन जंग ए हालातों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! प्रेम की उस सुहानी शाम तक हंसते मुस्कुराते दिन ढल गया ! प्रेम की दास्ता फिर छप रही थी आंसुओ के जज्बातों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! इश्क में जो गुजरी उस सुहानी रात का अब इंतजार है ! फिर कोई ख्वाहिश का ख्वाब आए टूटते तारो के नजारो में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! ना जाने अब ये कैसा मुश्किलों का नया दौर शुरू हुआ है ! खुद के जवाब मिलते नहीं पूछते हैं जो अब हजारों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! निगाहों की दरिया भी अब रूठने लगी है तेरी याद से ! कहीं से लौटे वो दिन मेरे तेरे दीदार के उन बहारों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! दिल ए हाल...

शीतलहरी

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फिर हवा बहने लगी कहने लगीं वनराइयाँ काँपने फिर-फिर लगीं ठहरी हुई परछाइयाँ। थरथराने से लगे कुछ पंख अपने नीड़ में एक छाया छू मुझे उड़, खो गई किसी भीड़ में ताल फिर हिलने लगा, फटने लगी फिर काइयाँ। एक भटकी नाव धारा पर निरखती दीठियाँ प्रान्तरों को चीरतीं फिर इंजनों की सीटियाँ अब कहाँ ले जाएंगी यायावरी तनहाइयाँ। भीत पर अंकित दिनों के नाम फिर हिलने लगे डायरी के पृष्ठ कोरे फड़फड़ा खुलने लगे उभरने दृग में लगीं पथ की नमी गहराइयाँ। 🌹🌹 विवेक कुमार मिश्र✍️✍️

मेरी बद्रीनाथ यात्रा

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मेरी बद्रीनाथ यात्रा यात्री- विवेक कुमार मिश्र अश्वनी कुमार मिश्र यात्रा समय - 13 की शाम से 18 की सुबह तक यात्रा दूरी - 2100 किलोमीटर चार धामो में एक हिमालय पर्वत श्रृंखला में शिवालिक श्रेणी के नर और नारायण पर्वत के मध्य श्री धाम आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित बद्रीनाथ धाम का उल्लेख कई पुराणों में भी आता है * "बहुनि सन्ति तीर्थानी दिव्य भूमि रसातले। बद्री सदृश्य तीर्थं न भूतो न भविष्यतिः॥"* अर्थात *स्वर्ग, पृथ्वी तथा नर्क तीनों ही जगह अनेकों तीर्थ स्थान हैं, परन्तु फिर भी बद्रीनाथ जैसा कोई तीर्थ न कभी था, और न ही कभी होगा।* इसी तरह वराहपुराण के अनुसार मनुष्य कहीं से भी बद्री आश्रम का स्मरण करता रहे तो वह पुनरावृत्तिवर्जित वैष्णव धाम को प्राप्त होता है, *"श्री बदर्याश्रमं पुण्यं यत्र यत्र स्थित: स्मरेत। स याति वैष्णवम स्थानं पुनरावृत्ति वर्जित:॥"*!! दीपोत्सव के महापर्व का पावन समय था हम और हमारे सहयात्री रहे अश्वनी मिश्र दोनो भाइयों ने जाने का निश्चय किया । और बड़े भाई सौजन्य त्रिपाठी जी को फोन किया अपनी बद्रीनाथ धाम जाने की पूरी ...