मेरी बद्रीनाथ यात्रा
यात्री- विवेक कुमार मिश्र
अश्वनी कुमार मिश्र
यात्रा समय - 13 की शाम से 18
की सुबह तक
यात्रा दूरी - 2100 किलोमीटर
चार धामो में एक हिमालय पर्वत श्रृंखला में शिवालिक श्रेणी के नर और नारायण पर्वत के मध्य श्री धाम आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित बद्रीनाथ धाम का उल्लेख कई पुराणों में भी आता है *"बहुनि सन्ति तीर्थानी दिव्य भूमि रसातले। बद्री सदृश्य तीर्थं न भूतो न भविष्यतिः॥"*
अर्थात *स्वर्ग, पृथ्वी तथा नर्क तीनों ही जगह अनेकों तीर्थ स्थान हैं, परन्तु फिर भी बद्रीनाथ जैसा कोई तीर्थ न कभी था, और न ही कभी होगा।*
इसी तरह वराहपुराण के अनुसार मनुष्य कहीं से भी बद्री आश्रम का स्मरण करता रहे तो वह पुनरावृत्तिवर्जित वैष्णव धाम को प्राप्त होता है, *"श्री बदर्याश्रमं पुण्यं यत्र यत्र स्थित: स्मरेत। स याति वैष्णवम स्थानं पुनरावृत्ति वर्जित:॥"*!!
दीपोत्सव के महापर्व का पावन समय था हम और हमारे सहयात्री रहे अश्वनी मिश्र दोनो भाइयों ने जाने का निश्चय किया ।
और बड़े भाई सौजन्य त्रिपाठी जी को फोन किया अपनी बद्रीनाथ धाम जाने की पूरी बात बताई उन्होंने सुनते ही कहा बहुत बढ़िया हुई आओ अच्छा समय है कैसे जाने की सोच रहे हो हमने अपनी पूरी बात बताई की भाई रवि त्रिवेदी जी से बात हुई तो उन्होंने बुलेट की सलाह दी कि ऋषिकेश से बद्रीनाथ बुलेट अच्छा ऑप्शन है सुनते ही हमने खुशी से हा कर दिया रूपरेखा सुनते ही सौजन्य भाई जी ने भी अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी फिर क्या था तुरंत गए फतेहपुर स्टेशन और फतेहपुर से हरिद्वार आने जाने का रिजर्वेशन करवा लिया।
ऋषिकेश पहुंचते ही रवि भाई ने बढ़िया छमिया टाइप झनझनाती हुई बुलेट की व्यवस्था पहले ही कर रखी थी जैसे ही हम लोग परमार्थ निकेतन पंहुंचे बड़ी गर्मजोशी से रवि भाई मिले यात्रा की बढ़िया जानकारी देते हुवे अपनी शुभकामनाओ के साथ बद्रीनाथ जाने वाले मुख्य मार्ग में हमको छोड़ कर अपने गंतव्य को चले गए।
घर से ही हमने निश्चय कर लिया था कि बद्रीनाथ पहुंचने से पहले पंच प्रयाग स्नान होंगे या कम से कम दरस परस तो जरूर करेंगे ही ।
तो आइए पहले पञ्च प्रयाग के बिषय में थोड़ा थोड़ा बता देते है.....
1- *देव प्रयाग* अलकनंदा और *भागीरथी* के संगम से बना है ये प्रयाग जो कि ऋषिकेश से 70 किलोमीटर आगे पड़ता है इस पवित्र स्थान में पहुंच कर हम लोगो ने संगम में प्यास बुझाई और दरस परस करके आगे की यात्रा शुरू की ।गढ़वाल क्षेत्र में भागीरथी को सास और अलकनंदा को बहु कहा जाता है और इसी संगम के बाद अलकनन्दा गंगा हो जाती है या कहे कि गंगा के नाम से जानी जाती है ।
2- *रूद्र प्रयाग* अलकनन्दा और *मंदाकिनी* के संगम को रुद्र प्रयाग से जाना जाता है यहा पहुंचते पहुंचते शाम के 6 बज गए तो दूर से दर्शन करके रात्रि विश्राम का निश्चय किया पुराणों में इस तीर्थ का वर्णन विस्तार से आया है यही पर ब्रम्हा जी की आज्ञा से देवर्षि नारद ने हजारो वर्ष की तपस्या करके महादेव को प्रशन्न करके सांगोपांग गंधर्व शास्त्र प्राप्त किया उसके बाद देवो के देव ने उन्हें *महती* नाम की वीणा प्रदान की थी ।।
सुबह बढ़िया रुद्रप्रयाग में स्नान और भगवान रुद्रनाथ में जलाभिषेक करके अगले प्रयाग की यात्रा शुरू की
3- *कर्ण प्रयाग* अलकनंदा और *पिण्डर* नदी का संगम है पिण्डर नदी को *विष्णुप्रिया व कर्ण गंगा* भी कहते है ये वही स्थान है जहां दानवीर कर्ण नित्य स्नान करके भगवान भास्कर की पूजा करते थे हम लोगो ने भी स्नान करके भगवान भास्कर का ध्यान किया और आगे बढ़ चले।
4- *नन्द प्रयाग* अलकनंदा और *नन्दाकिनी* का पावन संगम है पौराणिक कथा है कि नंद जी ने यही पर भगवान नारायण की तपस्या करके उनको पुत्र रूप में वर स्वरूप मांगा था और नंदा देवी का प्राचीन मंदिर भी है ये सब सुनने के बाद हम लोगो ने नंद प्रयाग में खूब नहाया और अपनी यात्रा को गति देते हुवे निकल पड़े श्री धाम के रास्ते।
*बृद्ध बदरी* पीपल कोठी से 27 किलोमीटर आगे और जोशीमठ से 6 किलोमीटर पहले मिले दिव्य स्थान के दर्शन हुवे अल्प विश्राम ही सही पर यात्रा का हमारा पांचवा विश्राम था बृद्ध बदरी के दर्शन के बाद जोशीमठ में *भगवान नरसिंह देव* का दर्शन लाभ लिया।
5- *बिष्णु प्रयाग* अलकनन्दा और *विष्णु गंगा कहे या धौली गंगा* यही से सूक्ष्म बदरी का स्थान शुरू हो जाता है यहाँ विष्णु कुण्ड और विष्णु मंदिर के दर्शन करना शुभ माना जाता है कहते है कि इस संगम के निकट जो दो ऊंचे पर्वत श्रृंखला है उन्हें भगवान विष्णु के प्रहरी कहते है *दाएं जय और बायें विजय*
तो यहाँ अधिक समय हो जाने के कारण हम लोगो ने दर्शन और दरस परस ही किया और फिर चल पड़े आठवें वैकुण्ठधाम श्री धाम बद्रीनाथ धाम की ओर
संध्या का पावन समय था वायु में छोटे छोटे बर्फ कणों की शानदार उपस्थिति हो चुकी थी कि हमलोगों ने श्री धाम में प्रवेश कर लिया था ।
अब हमको रुकने के लिए *सौजन्य भाई जी व राजेश भाई जी ने काली कमली वाले पंडा महराज* के रुकने की सलाह पहले ही मिल चुकी थी तो हम लोगो ने खोज शुरू कर दी पर अफसोस वो लोग दीपावली के पहले ही निकल चुके थे ।
फिर एक स्वामी जी मिले जिन्होंने *ब्रम्हकमल विश्राम गृह* में रुकने की सलाह दी और रास्ता बताया मन्दिर के ठीक नीचे पुल पार करते ही था अब क्या था समय 6 :15 का था 7 बजे पट बन्द होने की सूचना मिली थी तो तुरंत ही कमरे में बैग रखा गाड़ी लॉक की और निकल पड़े संध्या कालीन आरती और दर्शन लाभ लेने को फिर मिलता है प्रकृति का अनोखा रूप देखने को
एक ओर हल्की बर्फ बारी तापमान माइनस 7 डिग्री का तो दूसरी ओर अद्भुत अलौकिक 60 डिग्री तापमान का खौलता हुवा पानी जिसको *तप्त कुण्ड* के नाम से जानते है कहते है तप्त कुण्ड में डुबकी लगाकर दर्शन करने से कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है फिर क्या था।
भगवान बद्री विशाल का ध्यान करके धीरे से अपने को कर दिया तप्त कुण्ड के हवाले 4 मिनट तक कुण्ड में रहकर 11 डुबकी लगाई यात्रा की मानो सारी थकान ही खत्म हो गयी हो मन बिल्कुल शांत हो गया ।और फिर किया बद्री नाथ के दिव्य दर्शन
पूज्य पिता जी हमेशा कहा करते थे - *जो जाये बदरी वो फिर कभी न उदरी*
मतलब जो बद्री नाथ के दर्शन कर लेता है वो फिर जन्म नही लेता ये भी एक किवदंती ही है ।
तो इस यात्रा में हम लोगो ने प्रकृति के हर रूप का आनंद लिया *गर्मी-सर्दी, धूप-छांव, बर्फ-पानी, नदी-झरना, पहाड़-पठार, कच्चे-पक्के रास्ते*...!!
जीवन के कई उतार चढ़ाव महसूस किए आनंद दायक यात्रा रही पूरी यात्रा पूज्य पिता जी को समर्पित क्योकि ये यात्रा उनके साथ ही प्रतावित थी एक साल पहले से पर वो न रहे उनके ही आशीर्वाद व प्रेरणा से हम बागवान बद्रीनाथ के दर्शन कर सके ।
मातृपितृ चरण कमलेभ्यो नमः🙏
बद्रीनाथ की जय
श्री धाम की जय
बद्री विशाल की जय 🙏🙏
*विवेक कुमार मिश्र*✍️✍️























जय बदरी विशाल की
जवाब देंहटाएंजय बद्रीनाथ की
हटाएंजय हो श्री धाम की
जवाब देंहटाएं