दो जवाब मेरे सवालों के

मेरे सवालों के जवाब दो....

अगर प्रेम है मुझसे 
तो इतने प्रतिबंध क्यों है मन पर?
क्यों कोई बात तुम 
लफ्जों से नहीं कहते?
क्यों शब्द तुम्हारे होंठों पर आके
 रुक जाते हैं?
क्यों हर बात तुम 
अपने सीने में दफन कर लेते हो ?

अगर प्रेम है मुझसे 
तो शब्द क्यों नहीं होते हमारे बीच?
क्यों हर बात सिर्फ कोई, कहीं, कुछ नही
तक सीमित रहती है
क्यों छुपा लेते हो तुम अपनी हर भावना को
क्यों हर बात एक राज रहती है?

अगर प्रेम है मुझसे तो
क्यों कुछ निश्चित से शब्द होते हैं
 हमारे वार्तालाप में?
 क्या बस यही मोहब्बत होती है?
क्या तुम विश्वास नहीं करते मुझ पर
या दूसरों से मिले अनुभवों की सजा देते हो मुझे?

अगर प्रेम है मुझसे तो
क्यों हर सवाल का जवाब अधूरा देते हो? 
क्यों मुझे हर बात में उलझा देते हो ?
क्या मैं जानता नही हूँ
 यह तुम्हारा स्वभाव है 
या हमारे दरमियां कुछ दूरियां हैं? 
बहुत अधूरा सा लगता है
जैसे कोई मेरा होके भी मेरा नहीं है।

अगर प्रेम है मुझसे तो
क्यों खड़ी कर रखी है 
इतनी खामोशियों की दीवारें हमारे बीच तुमने?
किस भेद के खुलने का डर है तुम्हें
क्यों मुझसे हर बात राज रखनी जरूरी है
क्यों तुम मुझे बताकर भी कुछ नहीं बताते ?
कब समझोगे तुम 
अधूरे जवाब कितनी तकलीफ देते हैं।

सुनो........
प्रेम से गहरा तो कोई रिश्ता नहीं होता,
प्रेम में तो कोई पर्दा नहीं होता,
प्रेमियों के मन तो नग्न हो जाते हैं
एक दूसरे के सामने,
प्रेमी तो बहा देते हैं अपने मन की गंगा
और बांट लेते हैं सब सुख दुख,
प्रेमी तो बांट लेते हैं हर छोटी बड़ी बात,
कह देते हैं आपस में वह सब 
जो किसी और से नहीं कह पाते,
प्रेम में तो खुल जाते हैं हृदय के सब बंद द्वार
प्रेमी तो आपस में कुछ नहीं छुपाते,
प्रेम तो दो का एक होना होता है
फिर हम एक होकर भी दो क्यों हैं?

आज यह अतृप्त मन चाहता है
 तुमसे हर क्यों और क्या का जवाब 
क्यों तुम हर बात पर मुझे चुप करा देते हो?
क्यों मुझे कुछ कहने और सुनने का हक नहीं है?
क्यों नहीं जान सकता मैं 
तुम्हारी साधारण से साधारण बात भी?
मुझे मेरे सवालों का जवाब दो
या ये सारे भेदभाव मिटा दो।।

विवेकाजल🥺🥺।।

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