शबरी के बेर, सुदामा के तंदुल, विदुर की भाजी - क्या इनका कोई मोल हो सकता है। महत्व इस बात का है कि हम जो दे रहे है उसमें अपना हृदय उड़ेल रहे है या नहीं।
हर हर महादेव
"वसंत के आते ही मौसम खुशनुमा हो जाता है, गुलाबी ठंड के साथ चारों ओर रंग बिरगें फ़ूलों की भरमार हो जाती है। खेतों में फ़ूली हुई पीली सरसों की आभा निराली हो जाती है लगता है कि धरती पीत वस्त्र धारण कर इठला रही है। रंग बिरंगी तितलियाँ फ़ूलों पर झूमती हैं तो भौरों का गुंजन मन को मोह लेता है तभी कवियों का मन भी इस सुंदरता को अपने शब्दों से बांध लेने का हो जाता है। अमिया के बौर से लदी डालियों पर कोयल की कूक भी गीत कविता का अंग बन जाती है। कहीं दूर चरवाहे की बंशी की तान से ग्राम्य सुंदरता सुरभित हो जाती है। गाँव की अल्हड़ बाला के पाँव के पायल की छनक भी प्रकृति की ताल में ताल मिलाती दिखाई देती है। अदभुत नजारा इसी मौसम में देखने मिलता है। वसंत आने पर ही मदन देव का मद महुआ के फ़ूलों के रस के रुप में प्राप्त होता है। जिससे मस्त होकर मदनोत्सव का उल्लास निराला हो जाता है। कहते हैं कि जब ब्रह्मा ने मनुष्य योनि की रचना की तो वे अपनी रचना से संतुष्ट नही हुए। उन्हे लगा कि कुछ कमी रह गयी। क्योंकि चारों ओर मौन छाया हुआ था। सन्नाटा उन्हे पसंद नहीं आया। तो उन्होने अपने कमंडल से धरती पर जल डाला तो एक अदभुत श...
दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! दिल ए हाल लिख रखा था कोरे कागजों के चंद लिफाफों में !! कैसे संभाले अब खुद को टूटते इन ख्वाब के पन्नों से ! जीत कर भी हम तो हारे हैं इन जंग ए हालातों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! प्रेम की उस सुहानी शाम तक हंसते मुस्कुराते दिन ढल गया ! प्रेम की दास्ता फिर छप रही थी आंसुओ के जज्बातों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! इश्क में जो गुजरी उस सुहानी रात का अब इंतजार है ! फिर कोई ख्वाहिश का ख्वाब आए टूटते तारो के नजारो में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! ना जाने अब ये कैसा मुश्किलों का नया दौर शुरू हुआ है ! खुद के जवाब मिलते नहीं पूछते हैं जो अब हजारों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! निगाहों की दरिया भी अब रूठने लगी है तेरी याद से ! कहीं से लौटे वो दिन मेरे तेरे दीदार के उन बहारों में !! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में ! दिल ए हाल...
वेलेंटाइन डे और ब्रेक अप ! बाज आ जाओ मुहब्बत से... मुहब्बत वालों हमने इक उम्र गंवाई है, मिला कुछ भी नहीं!! क्या जमाना आ गया है । अब प्रेम के लिये भी दिन तय कर दिया है । बाजार इस दिन को मनाने के लिए लाल-गुलाबी हुआ जा रहा है । गिफ्ट से अटा पड़ा है । लाल-लाल पान के पत्ते के आकार के तरह तरह के दिल दुकानों के बाहर लटक रहे है । छोटे से लेकर आदमकद के टेडी बियर पसरे पड़े है । बाजार ने प्रेम को भी बिकने वाली चीज बना दिया है । जिससे भी मिलिये.. मोहब्बत से मिलिये... लोग बताते नहीं.. मगर तन्हा बहुत हैं... किसी से कह देना...... कि, "हम तुमसे प्रेम करत हैं" अहम को खतम करने का सबसे सुंदर पड़ाव है।। हमको भी घर मे लेटे लेटे कई दिन हो गए थे आज कुछ आराम भी था और अनुज भाई भी आये थे, तो सोचा चलो प्रदर्शनी घूम आये तो दोनों लोग टहलते-टहलते प्रदर्शनी पहुंच गए । रास्ते मे बाजार की रंगीनियों ने ध्यान खींचा । प्रेम .. ये कितना प्यारा अहसास है ! कुछ सोच कर आँखों में एक पुरानी चमक लौट आयी । अगर आपने सचमुच किसी से प्रेम किया है, तो आप जानते होंगे, प्रेम जताना नही पड़ता, बताना नही पड़त...
जय हो
जवाब देंहटाएं