चित्रकूट गिरि करहू निवासू

रात के साढ़े दस बज चुके थे ---- 

काफी उमस थी, निदिया रानी नजदीक फटक नही रही थीं, छत के बीचोबीच लटक रहे तीन पर वाले हवा वाहक यंत्र का ही सहारा था

जो अपनी धुन में नृत्य किये जा रहा था----

मेरी आँखें फियर फाइल्स के हॉरर शो पर टकटकी लगाए थीं----

तभी हमारे प्रिय , सदैव साथ निभाने वाले,हाथों पर राज करने वाले प्रिय REAL ME 5 ने दहाड़ लगाई

मैंने देखा तो उनके मुख मंडल पर अनुज भाई का नाम चमक रहा था

हमने भी कानो को तकलीफ दी, हांजी कैसे हो
तभी अनुज भाई काउंटर किया कि
कल सुबह 5 बजे चित्रकूट चलना है तैयार रहिये, आपको केवल कपड़े पहनकर गाड़ी लेकर चल देना है सम्पूर्ण तैयारी है और हा कपड़े दो जोड़ी रखिये
शेष बात मिलने पर होगी
ओवर एंड आउट 
फोन कट
मैंने सोचा ऐसे कैसे चलो देखते है सुबह हुई फिर 
अपनी तो हर मर्ज की दवा है अनुज भाई

मैं 5 बजकर 05 मिनट पर निकलने को तैयार था कि अनुज भाई समेत राजेश भाई, सुशील बाबू, सुधीर बाबू घर आ गए , फिर औपचारिक मिलन हुवा लौकी की स्वादिष्ट बर्फी और चाय के बाद मैं से *हम पांच* हो गए थे , हम पांचों की *पंच प्रयाग* पहुचने की *इच्छा* प्रबल थी क्योकि सौजन्य भाई के लेख का जादू सर चढ़कर बोल रहा था।

हम पांच थे अनुज, राजेश भाई
 और *सुधीर बाबू* और *सुशील बाबू* और मैं और मेरी पुंटो।
पुंटो ने *अपनी शक्ति* से *हमारी इच्छाओं* को उड़ान देने की प्रक्रिया में जुट गयी।
*हम पांच, पंच प्रयाग, और हमारी पुंटो*  

आप सोच रहे होंगे ये पुंटो कौन

तो बता दूं कि हम सभी हमारी नई नवेली तो नही पर ठीक ठाक *फिएट पुंटो* गाड़ी पर सवार थे।

लॉक डाउन की मारी सुनसान सड़को पर तीव्र वेग से हम मंजिल की ओर बढ़ चले।
3 घण्टे की यात्रा के बाद हम *हनुमान धारा* में खड़े थे। हमारे शिवा एक्का-दुक्का यात्री ही वहाँ थे , अंतः वस्त्रों को लेकर हम सभी हनुमान धारा की सीढ़ियों की ओर बढ़ चले, लगभग 20 मिनट बाद हनुमान धारा के पहले पड़ाव पर थे , दर्शन के बाद पुनः आगे बढ़ चले , इसी बीच बंदरो को चने खिलाये गए और कुछ फोटोबाजी

कुछ सीढ़िया चढ़ने के बाद सभी के वाह्य वस्त्र उतर चुके थे और हनुमान धारा के शीतल जल में नहाने की होड़ लगी थी। 
तपती धूप और इतनी चढ़ाई के बाद वो जल अमृत से प्रतीत हो रहा था। स्नान के बाद हनुमान जी के दर्शन हुए 

वापसी में चाय पीने की इच्छा बलवती हो रही थी, अभी कुछ सीढ़िया उतरे ही थे कि सीढ़ियों पर ही बैठा एक बालक बोला बाबू जी चाय पी लीजिए। 

राजेश भाई बोले ये होती है प्रभु कृपा चाय की इच्छा हुई चाय हाजिर

सभी ने चूल्हे की बनी चाय पी और आगे बढ चले।
अब मंजिल थी सीधे *पंच प्रयाग* चल पड़े पंच प्रयाग की ओर
पर अभी तो *महासती अनुसुइया जी* का बुलावा आ गया , रास्ता भूलकर पहुंच गए महासती के दरबार, 
मा के दर्शन के बाद सीधे पंच प्रयाग की ओर चल दिये ,ऊबड़-खाबड़ सुनसान जंगली रास्ता
एक भी व्यक्ति नही मिला रास्ते मे ।

हम देवरहा बाबा की तपोस्थली पंच प्रयाग पहुच चुके थे, स्वामी जी ने बताया की अभी तो फतेहपुर से डॉक्टर साहिबा और सौजन्य जी आये थे।

एकदम शांत, मनोरम, प्रकृति की खूबसूरत गोद 
में स्थित आश्रम , 

अद्भुद वातावरण था , जल्दी ही पुनः स्नान के लिए निकल पड़े

सुशील और अनुज  तो जल के खिलाड़ी है दोनो ने ही छलांग लगा दी हम कहा पीछे हटने वाले थे खूब लम्बी लम्बी छलांग लगाई फिर देखा तो राजेश भाई और सुधीर बाबू बाहर ही थे बार बार कहने पर  दोनों गहराई देखकर किनारे ही नहाने लगे।
अब आश्रम में वापस आकर भोजन पर हम सभी टूट पड़े।
घर से लेगये थे भरी हुई तरोइया, लहसुन की चटनी, भरा स्वादिष्ट मिर्च, आम का अचार, लौकी की बर्फी, मेवों के लड्डू , क्या कहने थे भोजन के ----
इसके बाद वही आराम
और संत संगति
चार बजे हम वहा से *आरोग्य धाम* के लिए निकल पड़े।
अब बारी थी लाई चने और नमकीन की

बीच बीच मे हमारा मार्ग दर्शन सौजन्य भाई करते जा रहे थे
तभी उनके द्वारा पता चला कि मैहर भी बंद और खजुराहो भी बंद
चित्रकूट रात्रि विश्राम का कार्यक्रम स्थगित हो चुका था ।

जलधारा हो और हम और अनुज





भाई जलक्रीड़ा न करे 
असम्भव 
अब हम तीसरी बार जलक्रीड़ा कर रहे थे

जल्द ही स्नानोपरांत हम *कामदगिरि पर्वत* की ओर चल पड़े ।

जैसे ही मुख्य द्वार पर पहुचे *आदरणीय अमित भैया* हमे आशीर्वाद  और अपने स्नेह देने हेतु होठो पर मधुर मुस्कान के साथ खड़े थे।
 
कामदगिरि के कपाट सौभाग्य से खुल चुके थे 
भीड़ न के बराबर थी ,बहुत ही इत्मीनान से प्रभु के दर्शन हुए ।दर्शन के बाद हम परिक्रमा मार्ग पर निकल पड़े अब हम पांच से छः हो गए थे क्योकि परिक्रमा में हमे अमित भैया का भी साथ प्राप्त हो चुका था।

परिक्रमा के दौरान अमित भैया ने अपने स्नेह से डूबी चाय पिलाई व प्रेम में लिपटी नमकीन भी खिलाई

फिर आगे बढ़ चले , जैसे ही खोही आयी तो अमित भैया ने फिर अपने स्नेह की चाशनी में डूबे हुए रसगुल्ले खिलाये

घड़ी साढ़े सात बजा रही थी , हमारी परिक्रमा भी समाप्त हो चुकी थी। 

अब हमें भी घर पहुचने की जल्दी थी ,  अमित भैया का लौकी की बर्फी से मुह मीठा करवाकर दूसरी बार आने के वायदे के बाद विदाई ली गयी।

सभी ने कामदगिरि को प्रणाम किया और चल दिये अपने आशियाने की ओर-------

विवेक कुमार मिश्र✍️✍️
जय कामतानाथ स्वामी की🙏

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