माथेरान
इस बार ऐसी जगह ले चलूँगा ,तबीयत मस्त हो जाएगी , शानदार जगह है ....सौजन्य भाई की आदत से परिचित हूँ कि इनकी नजर ही इतनी मस्त है ,हर जगह इनको शानदार लगती ...देखूँ तो जानूँ ....स्थल का नाम बताया #माथेरान# , ज्यादा चर्चित नहीं है ,ज्यादा सुना भी नहीं था इसलिए सामान्य तौर पर ही ले रहा था ।
पुणे से डायरेक्ट माथेरान के लिए अर्टिगा गाड़ी हायर कर ली गई क्योंकि यहाँ से कोई बस या ट्रेन सीधे नहीं है ....जैसे जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी माथेरान के रहस्य की परतें खुल रही थीं ....
माथेरान मुम्बई से लगभग 100 किमी दूर एक हिल स्टेशन है ...क्या किसी ने कल्पना की है किसी हिल स्टेशन में जाने की एंट्री फीस लगती है ....सिर्फ पैदल ,टॉय ट्रेन या घोड़े से ही पहुँचा जा सकता है , मोबाइल टॉवर तक नहीं है , हाथ से खींचने वाले रिक्शे चलते हैं ....घना जंगल है ,झील है ,मंदिर है ... माथेरान आकर प्रेयसी याद ना आ जाये तो कहना ... माथेरान आकर ये कहोगे कि माथेरान ना देखा तो क्या देखा ...
अब हमारी गाड़ी गोल गोल चक्कर खाती हुई ऊपर और ऊपर चढ़ती जा रही थी ...और एक जगह पर गाड़ी पार्क करते हुए ड्राइवर बोला ...साहब सेवा समाप्त , आगे गाड़ी नहीं जाती ....हम चार पंकज , अमित ,सौजन्य और मैं अवाक थे ...ये कौन सी बात ,अब पहाड़ में हम तीन किमी कैसे जाएंगे ...विंटर वैकेशंस का टाइम चल रहा था , भीड़ भी हल्की फुल्की थी ...तभी एक व्यक्ति ने आकर हमारे चार बड़े बैग अपनी पीठ पर लाद लिए .. बोला 50 रुपया दे दीजिएगा , स्टेशन तक छोड़ देंगे ...हम भी सोचे चल भाई , तेरा भी कुछ भला हो जाएगा ....एक गेट के पास ले जाकर बोला साब टिकट ले लीजिए यहाँ प्रति व्यक्ति 50 रुपिया एंट्री फीस लगती ....
हम चारों हाथ हिलाते मस्ती में चलते चले जा रहे थे ...पर कुछ तो था यहाँ जो हमें मदहोश किये जा रहा था ...कुछ तो था जो हमारी चाल मस्तानी बना रहा था ....कुछ तो था जो हमें बेखबर किये जा रहा था ... किसी के साथ होने का अहसास था , अदृश्य अहसास जिसे सिर्फ महसूस किए जा रहे थे हम ...स्टेशन आ गया ...बाकी तीन पर भी वैसा ही असर हो रहा था , जो मुझ पर हो रहा था .... जीवन मे पहली बार टॉय ट्रेन पर बैठने का मौका मिला ...टॉय ट्रेन मन्द मन्द गति से चढ़ती जा रही थी और हम अनायास ही फिल्मी गीत गुनगुना रहे थे ...अजीब सी मस्ती सवार थी हम पर उसके साथ की ....अब उसको भरपूर देखने और बात करने का मौका मिल गया था ....मैं पूँछ बैठा कौन हो तुम ...वो बोली "प्रकृति"....तुम तो हर जगह हो , पर यहाँ पर कुछ खास हो ....बोली , अभी तो पहचान हुई है ...मैं तपाक से बोला ,"मुझसे दोस्ती करोगी" ....तभी एक हवा के झोंके ने मुझे स्पर्श किया और मेरा रोम रोम खिल उठा ....माथेरान स्टेशन से बाहर आ चुके थे ...
उफ्फ कुछ तो बात है यहाँ ...कुछ लोग कहते हैं , अगर दिल में रोमांस हो तो हर जगह रोमांटिक लगती है ....पर यहाँ आकर लग रहा था अगर जगह रोमांटिक हो तो ...हहहह.......
रात के ठिकाने की बेहद सस्ती जगह मिल चुकी थी ...सज सँवर कर अपनी दोस्त से मिलने निकल चुके होटल से ...वो फिर साथ हो ली , मैं उससे बात करने लगा ...कितनी सुंदर हो तुम ...बोली ,तुम सुंदर तो मैं भी सुंदर , मुझे कोई इतने प्यार से देखता ही नहीं ...एक बार जी भरकर देखो तो मुझे ,मेरे सिवा कोई भी अच्छा ना लगेगा तुम्हें , देख लेना प्यार हो जाएगा मुझसे...मैं बोला , चल झूठी ...अभी तो दोस्ती हुई है अब प्यार पे आ गयी ....
शाम हो चुकी थी एक अजीब सी मादकता सवार थी हवाओं में ...सब कुछ अच्छा लग रहा था , फोटोग्राफ्स लिए जा रहे थे ...प्रेमी युगल , बच्चे सभी इधर से उधर भौरों की भाँति उमंग से भरे हुए थे ...भूख लगी तो गणेश शाकाहारी भोजनालय की याद आयी , जबकि उससे पहले स्वीट कॉर्न ,गोलगप्पे , चाय सब जा चुकी थी पेट में ....भोजन करके बाहर निकले तो आइसक्रीम तो बनती ही थी ...रात के दस बज चुके थे , प्रकृति बोली जाओ दोस्त निन्नी कर लो ...मिलते हैं फिर सुबह ....
रात ने मजबूर कर दिया था उसके बारे में सोचने को ...वो कितनी अच्छी है , फिर भी लोग उसको तड़पाते हैं , अपने फायदे के लिए ...तोड़ते हैं दिल उसका , ठेस पहुंचाते हैं उसको ....धुँआ छोड़ते हैं विलासिता का , करते हैं दोहन अपनी हवस का ...छेड़ते हैं उसको अपनी गन्दी सोंच से ...रोकते हैं उसके प्रवाह को बिना परवाह किये ....ओह कितने कष्ट में है वो ....जो सिर्फ दूसरों प्रेम के लिए बनी है , कितने दुख में है वो ....कितनी कोमल है वो और कितने कठोर हैं हम सब ....नहीं अब और नहीं .....उसको समझ ही ना पाया कोई , अपनी नासमझी से ...कितना दिल दुखाया है लोगों ने उसका ...मन करुणा से भर गया ....ये हो क्या रहा था मुझे दोस्ती अब दया का भाव ले रही थी ...
कब सुबह हो गयी पता ही ना चला ...मन द्रवित था ,पर फिर से उसके साथ ने उमंग भर दी ...अब उसको और जानने का दिल करने लगा ...
सौजन्य भाई ने हजार रुपये प्रति घोड़े के दाम वाले घोड़े को अपने मायाजाल में ऐसा फंसाया कि महज ढाई सौ रुपये में चार घोड़े तैयार हो गए ....अब वो आगे आगे हम पीछे पीछे ...वो जितना आगे जाती हम उतना ही भूलते जा रहे थे , घरबार , नौकरी , समस्याएं , परेशानियां ....आनन्द के महासागर में गोते लगवा रही थी वो , जिसमें डूबते जाना था ...गहरे और गहरे .........अचानक वो बोली मैंने कहा था ना , प्यार हो जाएगा मुझसे ....वो एक मंदिर में ले गयी हमें ...बोली ,एक बार आँखे बंद करके सोचो मेरे बारे में ...क्या मैं ऐसी हूँ ,जिसे कोई तकलीफ पहुंचाए .....
आँखे बंद थी ,पर सच में खुल तो अब गयी थीं ...तुम हो प्रेम के लिए ...तुम ही ईश्वर हो ...तुम ही सब कुछ हो ....तुम प्रसन्न तो हम प्रसन्न .....एक सीख दे गई वो ...प्रेम करना सिखा गयी वो ....
चलते चलते बोल ही पड़ी वो ...
मुझ जैसा प्रेम करके देखो ना एक बार ...जिसमें ना कोई आशा हो ना अभिलाषा ....ना तन की भूख हो ना विरह की पीड़ा ....
हो तो आनन्द किसी के सुख का ....हो तो सन्तोष भोले आशुतोष सा ....
अब अपनी प्रेयसी से विदा लेने का समय आ गया था , पर विदा कैसी ....वो तो अब साथ ही रहेगी अगर हम उसे दूर करेंगे उसके दुश्मनों से ....
चलते चलते हम चारों बोल ही बैठे
विवेक कुमार मिश्र✍️✍️

आनंदमयी यात्रा
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