आलम दिल का

दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !
दिल ए हाल लिख रखा था कोरे कागजों के चंद लिफाफों में !!

कैसे संभाले अब खुद को टूटते इन ख्वाब के पन्नों से !
जीत कर भी हम तो हारे हैं इन जंग ए हालातों में !!
दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !

प्रेम की उस सुहानी शाम तक हंसते मुस्कुराते दिन ढल गया !
प्रेम की दास्ता फिर छप रही थी आंसुओ के जज्बातों में !!
दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !

इश्क में जो गुजरी उस सुहानी रात का अब इंतजार है !
फिर कोई ख्वाहिश का ख्वाब आए टूटते तारो के नजारो में !!
दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !

ना जाने अब ये कैसा मुश्किलों का नया दौर शुरू हुआ है !
खुद के जवाब मिलते नहीं पूछते हैं जो अब हजारों में !!
दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !

निगाहों की दरिया भी अब रूठने लगी है तेरी याद से !
कहीं से लौटे वो दिन मेरे तेरे दीदार के उन बहारों में !!
दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !

दिन की ख्वाहिशों के ख्वाब कैद थे रात की बन्द किताबो में !
दिल ए हाल लिख रखा था कोरे..


विवेक कुमार मिश्र✍️✍️

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